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पूरी रात की नींद
बांछें खिल गई थी, दरवाजे पर खड़े देवदूत, भरपेट भोजन का निमंत्रण और पूरी रात की नींद के आसार देखकर, खपरैल छज्जों को चीरकर निकलता हुआ.... चूल्हे का धुआं.... हवन कुण्ड का पवित्र धुआं ही तो था.... शांत, नम और आभारी आँखें....... संभावनाओं को तलाशते हुए, देखने लगे थे सपने..... मुसकाते चेहरों का, एक नई सुबह का ............. __________________________________
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